• flash-5.jpg
  • flash-11.jpg
  • flash-21.jpg
  • flash-31.jpg

संगमन-22 की रिपोर्ट

संगमन’ -22  वैचारिक उत्तेजना और युवाओं की सक्रिय भागीदारी के साथ संपन्न

संगमन पहला दिन: 'बिकी हुई नहीं, बेचने वाली चीज़ है मीडिया'

मडगांव (गोवा) के रवींद्र भवन में  संगमन’  का 22 वां संस्करण अपनी पूर्व विशिष्टता को बरकरार रखते हुए शुरु हुआ।उल्लेखनीय है कि संगमन  में  मंच पर केवल वहीहोता है, जो अपने विचार रख रहा होताहै और कोई मुख्य अतिथि आदि नहीं होता। यहां रचनाकारों को रचनाकारों की तरह बरततेहुए उसने उनके बीच बराबरी का समान वितरण किया जाता है ।   .

 ‘आरोह 2020: आकलन और दायित्वविषय पर केंद्रित संगमन-22 के पहले सत्र की शुरुवात कोंकणी भाषा से संबद्ध अनंत अग्नी के संचालन  में हुई । सबसे पहले संगमन परिवार के संस्थापक सदस्य कमलेश भट्ट कमल ने संगमनके परिचय में इसके सचल होने  को इसकी विशेषता बताया. उन्होंने कहा कि इसके सत्र बहुत अनौपचारिक होते हैं.  इसके बाद कोंकणी भाषा मंडल के अध्यक्ष चेतन आचार्य ने कहा कि कोंकणी  भाषा, संस्कृति और समाज का अन्य  भाषाओं से भी संवाद हो सके, इसलिए हम संगमनसे जुड़ रहे हैं. कोंकणी को  एक उपेक्षित भाषा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसके अधिकारों के लिए हमें बहुत लड़ना  पड़ा है और यही वजह है कि ये भाषा आज इतनी ज़िंदादिल  लगती है.

युवा रचनाकारों, पाठकों और शोधार्थियों की उल्लेखनीय उपस्थिति में चेतन आचार्य के बादप्रतिष्ठित मराठी लेखक राव साहेब कसबे ने अपने अनुभवों के साथ-साथ वेद, उपनिषद्, गांधी, आंबेडकर आदि से पुष्ट करते  रहे. इसके अतिरिक्त भी कई स्रोत-संदर्भों से संपन्न उनके वक्तव्य में मौजूदा  राजनीति से लेकर मनुष्य की उत्क्रांति, विकासक्रम, उसका उत्थान, पतन सब कुछ खुलता चला गया. अपने वक्तव्य को उन्होंने इस बिंदु परखत्म किया कि उनकी दिलचस्पी इसमें नहीं है कि गांधी और आंबेडकर के सपनों का भारत  कैसा होगा, उनकी दिलचस्पी इसमें है कि  आज के युवाओं के सपनों का भारत कैसा  होगा.

विचारों की उत्तेजना से भरे इस वक्तव्य के बाद रंगकर्मी संदेश  प्रभुदेसाई ने स्ट्रीट थिएटर को संसार का एक पवित्रतम स्पेस बताते हुए उसे फर्स्ट थिएटरमानने-कहने पर जोर दिया.  इसके लिए उनका   तर्क स्ट्रीट थिएटर को ही जन-रंगमंच मानने के आग्रह से आंदोलित था.जन-रंगमंच के इतिहास और भूमिका से अच्छी तरह परिचित संदेश ने अपना वक्तव्यअंग्रेजी में दिया.. कोंकण के एक गांव में पत्रकारिता और स्त्री-मुद्दों पर काम कर रहींयुवा कार्यकर्ता नमन सावंत के लिखित पर्चा ने भी सभी श्रोताओं को काफी प्रभावितकिया । स्त्री की प्राचीन और नवीन उपस्थितियों पर विचार करते हुए मन के वक्तव्यमें एक अनूठा स्त्री-आवेग मौजूद था. इस वक्तव्य का प्रत्येक वाक्य संघर्ष, अनुभव और अध्यवसाय कीउत्तेजना से आप्लावित था.

संगमनके पहले दिन के पहले सत्र  का समापन प्रख्यात मराठी लेखक सतीश कालसेकर के वक्तव्य से हुआ. वो मराठी में बोलेऔर मराठी जानने वालों के मुताबिक वो अपने विषय और प्रतिष्ठा के अनुरूप ही बोले.

संगमन दूसरा दिन:

 ‘संगमनके 22 के दूसरे दिन की शुरुआत  प्रसिद्ध कोंकणी लेखक दामोदर मावजो के वक्तव्य से हुई. गोवा के इतिहास और इसकीसंस्कृति की विशेषताओं में उतरते हुए उन्होंने कहा कि गोवा के बारे कुछ गलत तथ्यप्रचलित हैं. गोवा को एक ईसाई-बहुल प्रदेश माना जाता है, जबकि सच्चाई ये है कि गोवामें सिर्फ 25% ईसाई हैं और 65% हिंदू हैं. पारस्परिकसद्भाव को मावजो ने बहुत गंभीरता से रेखांकित करते हुए कहा कि गोवा और कोंकणीसाहित्य दोनों में ही अदरिंग फैक्टरनहीं नज़रआएगा.

भारत में व्यापार करने के इरादे से आकर, लोगों को अपना गुलाम बनालेने वाली ताकतों के क्रमवार विश्लेषण से गुजरते हुए हिंदी लेखक-विचारक जितेंद्रभाटिया ने इस प्रश्न को सामने रखा कि आखिर इस दुनिया का मालिक कौन है’. किसानों, श्रमिकों और वंचितों के शोषण और दमन के लिए रची गई नई शब्दावली औरसकल आय के असल तथ्यों के बीच उन्होंने कहा कि बाजार आज असहयोग आंदोलन तक का  इस्तेमाल अपना तेल बेचने के लिए कर रहा है..

विदर्भ के किसानों के बीच काम कर रहे मराठी पत्रकार जयदीप हार्डीकर  ने कृषि-संकट को अर्थव्यवस्था का संकट बताते हुए कहा कि साढ़े सात करोड़ किसानों नेगए बीस सालों में किसानी छोड़ दी है. वे सर्विस-इकानॉमी में आ गए हैं औरमानसून-विमर्श मध्यवर्गीय जीवन से बाहर हो गया है. प्राकृतिक संसाधनों पर शहरीलोगों का अधिकार बढ़ता जा रहा है. 2015-16 के अकाल को अपने बयान में बहुत सारे आकड़ों के साथ लाते हुए जयदीप नेकहा कि 130 प्रमुख नदियां इस दरमियान

समुद्र में मिली ही नहीं.

हिंदू परंपरा आर्थिक समानता की बात नहीं करती है. बुद्ध ने भी  सामाजिक विषमता की बात की, लेकिन आर्थिक विषमता की नहीं. इन बिंदुओं के साथ समानता पर विचारकरते हुए कोंकणी विचारक दत्ता नायक ने कहा कि आर्थिक समानता की बात सिर्फ कार्लमार्क्स के यहां मिलती है. इसके बाद पर्यावरणविद् राजेंद्र केरकर ने जंगलों की औरमाग्दालीन डिसूजा ने अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अपने वक्तव्य दिए.

लोकमतके संपादक राजू नायक ने कहाकि आज सामान्य लोग बगैर किसी नेतृत्व के सरकार के विरुद्ध उठ रहे हैं. ऐसे में नागरिक-चिंताओं को केंद्र मेंरखकर विचारकों और एक्टिविस्ट्स को एक साथ आने की जरूरत है.कोंकणी कवि-लेखक दादू मांद्रेकर ने हाल ही में हुईं लेखकों-कलाकारोंकी हत्या पर बहुत मुखर प्रतिरोध दर्ज किया. वैदिक संस्कृति और पाखंड पर उन्होंने  बहुत ओजपूर्ण भाषा में प्रहार करते हुए कहा कि आज विरोध में उठने वाली सारी आवाजेंकुचली जा रही हैं.

भोजनावकाश के बाद शुरू हुए संगमनके दूसरे दिन के दूसरे सत्र का संचालन चर्चित हिंदी कथाकार वंदना रागने किया. इस सत्र के पहले वक्ता थे कवि-विचारक लाल्टू. उन्होंने कई महत्वपूर्णकवियों की पंक्तियों को उद्धृत करते हुए कहा कि अदब से जुड़े हुए व्यक्ति की सोचमानव-केंद्रित होती है. राष्ट्रवाद वृहद मानवीयता के विचार को कुचलता है.लाल्टू नेकहा कि बुद्धिजीवियों पर हमले कोई नई बात नहीं है. इस तरह के हमले पहले भी हुए हैंहमले और हत्या अदब में विवेक बनाए रखने की कीमत हैं.

सरस्वती सम्मान प्राप्त कोंकणी साहित्यकार महाबलेश्वर सैल नेसाहित्यिक-जीवन से जुड़े अपने अनुभव बहुत सहज और मार्मिक ढंग से सुनाए. उन्होंनेकहा कि मेरे अनुभव मेरे साहित्य में घुल-मिल गए हैं. सैल के वक्तव्य के बाद युवाकार्यकर्ता प्रवीण सबनीस ने युवाओं पर, अमिता गुरव ने रंगमंच पर, प्रशांत नायक ने छात्र-आंदोलन पर और रत्नमाला ने बाल-साहित्य पर अपनेविचार रखे.

आखिर में समापन सत्र में बोलते हुए प्रतिष्ठित साहित्यकार और संगमनके संरक्षक गिरिराज किशोरने इस आयोजन को सफल बताते हुए कहा कि जो अपनी भाषा से प्यार करते हैं, वही दूसरी भाषाओं से भी  प्यार करते हैं. उन्होंने आगे कहा कि जो काम अंग्रेज कई सालों में नहीं कर पाए, उसे मौजूदा सरकार सिर्फ तीन  सालों में ही करने कामयाब रही है. आज घर-घर बंट गया है. हाल ही में  बी एच यू  में अपने अधिकारों के लिए  आंदोलन कर रहीं छात्राओं पर हुए लाठीचार्ज को उन्होंने आजाद भारत की सबसे शर्मनाक  घटनाओं में से एक बताते हुए कहा कि इस सरकार के सारे फैसले देश का आर्थिक औरवैचारिक शोषण कर रहे हैं.

अंत में संगमन की ओर से कमलेश भट्ट कमल ने सफल व सुनियोजित आयोजन केलिए कोकणी साहित्य मंडल व तत्रशिला एजुकेशन सोसायटी का आभार व्यक्त किया और अगलेसंगमन के लिए एक नए जोश व ऊर्जा लिए सबने विदा ली।

 

रिपोर्ट-अविनाश मिश्र